कॉरपोरेट मीडिया का प्रोपेगेंडा : पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि पिछले 10 वर्षों में पत्रकारिता की स्वतंत्र आवाज को किसने दबा दिया? सत्ता पक्ष से सवाल न पूछने वाली पत्रकारिता आज लगभग गायब हो गई है। उल्टा, विपक्ष से ही सवाल पूछना मीडिया का नया ट्रेंड बन गया है। महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों पर कॉरपोरेट मीडिया में कोई सार्थक बहस या खबर दिखाई नहीं देती है।
दरअसल, पिछले एक दशक में मीडिया का जो नया रूप सामने आया है, उसे भटकी हुई और एजेंडा-प्रधान पत्रकारिता ही कहा जा सकता है। पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित कॉरपोरेट मीडिया क्या सच में सत्ता से सवाल पूछ पाती है? लगातार आरोप लग रहे हैं कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग “गोदी मीडिया” बनकर रह गया है। हिंदू-मुस्लिम डिबेट्स के जरिए अपने चैनल पर नफरत परोसने वाली गोदी मीडिया की असलियत अब सबके सामने आ गई है। जब सत्ता के नीतियों का विरोध बुद्धिजीवी और आम जनता करने लगी हैं तब अंजना ओम कश्यप जैसे पत्रकार आम जनता और बुद्धिजीवों को निशाना बनाने लगी है।
कॉम्पिटेटिव एग्जाम की तैयारी करने वाले छात्रों को बहुत ही कम पैसे में पढ़ाने वाले पॉपुलर शिक्षक खान साहब ने नीट परीक्षा और दूसरे परीक्षा के लीक होने पर आक्रोश जताया और बेरोजगारों के साथ खड़े हो गए तो मीडिया की एंकर अंजना ओम कश्यप ने दो कौड़ी का शिक्षक बताकर उनका अपमान किया। इस पर खान सर की प्रतिक्रिया आई। उन्होंने अंजना ओम कश्यप की पत्रकारिता पर ही सवाल उठा दिया। दरअसल खान सर ने अंजना ओम कश्यप की सत्ता पक्ष को संरक्षण देने वाली पत्रकारिता पर ही सवाल उठा दिया।
ताजा मामला: अंजना ओम कश्यप और खान सर
हालिया विवाद नीट जैसी परीक्षाओं के बार-बार हो रहे पेपर लीक और शिक्षक खान सर से जुड़ा है। बेरोजगार युवाओं का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। परीक्षाओं में लगातार पेपर लीक होने से युवाओं में गुस्सा बढ़ रहा है, जबकि सरकार इस मुद्दे पर गंभीर कदम उठाने में नाकाम नजर आ रही है।
जैसे ही खान सर ने पेपर लीक के खिलाफ बेरोजगार युवाओं के आंदोलन का समर्थन किया, कॉरपोरेट मीडिया और कुछ एंकर उनके खिलाफ बयानबाजी पर उतर आए। अंजना ओम कश्यप ने हाल ही में एक बयान में लोकप्रिय शिक्षक खान सर जैसे सम्मानित शिक्षकों के लिए अभद्र टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि “शिक्षक दो कौड़ी के होते हैं”।
यह टिप्पणी सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं थी, बल्कि कोचिंग शिक्षकों को बदनाम करने और सरकार की नाकामी को छुपाने का हिस्सा लगती है। बेरोजगार युवा अपने भविष्य को लेकर पहले से ही आक्रोश में हैं। ऐसे में अंजना ओम कश्यप जैसे एंकरों की जिम्मेदारिहीन टिप्पणियों ने मामले को और भड़का दिया है।
मीडिया की साख पर सवाल
भारत के युवा और शिक्षक अब कॉरपोरेट मीडिया के इस रवैये के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। वास्तव में, मुख्यधारा की पत्रकारिता की साख पहले ही काफी गिर चुकी है। कई पूर्व पत्रकार, जैसे आशुतोष, और विपक्षी नेता राहुल गांधी भी बार-बार मीडिया के पक्षपात और “गोदी” होने के आरोप लगा चुके हैं।
पत्रकारिता जनता की आवाज होनी चाहिए, लेकिन आज बड़ी-बड़ी पूंजीवादी मीडिया कंपनियां आम आदमी की आवाज नहीं उठा रही हैं। महंगाई बढ़ रही है, लेकिन गोदी एंकर इसे “कंपनियों के घाटे” का मुद्दा बताकर हल्का कर देते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली पर सत्ता से सवाल पूछने के बजाय वे “आम कैसे खाया जाता है” जैसे मुद्दों पर बहस करते नजर आते हैं।
मीडिया का दोहरा मापदंड
एक सरकारी चैनल के एंकर ने एक छात्र को “आतंकवादी” तक कह दिया। खबर हफ्ते भर सुर्खियों पर बनी रही । दरअसल मामला आया था कि 12वीं कक्षा की सीबीएसई बोर्ड के रिजल्ट जारी हुआ। 12वीं कक्षा के एक छात्र ने अपनी आंसर शीट सीबीएसई से की कॉपी प्राप्त की और उसने देखा कि उसके आंसर शीट का पहला पेज उसका था और बाकी के पेज किसी और का था। साथ में इस पर आपत्ति जताते हुए मीडिया में अपनी बात रखी। सरकारी न्यूज़ चैनल के एक एंकर ने छात्र को आतंकवादी घोषित कर दिया। यानी कोई अपनी बात और न्याय हासिल करने के लिए सामने आए तो ये शातिर मीडिया आवाज उठाने वाले को प्रताड़ित करती है। सोशल मीडिया में इसकी बहुत निंदा हुई मीडिया के इस चेहरे को देखकर लोगों ने भी कहा शर्म करो।
बाद में सीबीएसई बोर्ड ने अपनी गलती स्वीकार की और छात्र अपनी जगह सही था। सीबीएसई बोर्ड ने उसकी आंसर शीट खोज कर उसकी कॉपी दी। लेकिन तब तक मीडिया का एक वर्ग अपना खेल खेल चुका था यानी जो सवाल पूछे उसे आतंकवादी घोषित कर दो या पाकिस्तान इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है दरअसल एजेंडा वाली मीडिया का यही चेहरा है।
इसलिए कि उसकी आंसर शीट में कुछ पन्ने मेल नहीं खा रहे थे। बाद में CBSE ने अपनी गलती स्वीकार की, लेकिन उस एंकर ने माफी मांगने की जरूरत नहीं समझी। यही मीडिया जब खान सर जैसे शिक्षकों पर हमला करता है, जो छात्रों के हक में बोल रहे हैं, तो उसका चेहरा साफ हो जाता है।
आज सोशल मीडिया, यूट्यूब और स्वतंत्र आवाजें मुख्यधारा की मीडिया की पोल खोल रही हैं। लोग अब समझने लगे हैं कि पूंजीपति मीडिया और सत्ता के बीच गठजोड़ है, जिसके कारण आम जनता की असली समस्याएं दबाई जा रही हैं।
पेपर लीक और कोचिंग जगत: प्रोपेगैंडा बनाम सच्चाई
हाल ही में NEET-UG परीक्षा के पेपर लीक विवाद ने पूरे देश को हिला दिया है। लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर जब बहस हो रही है, तो कुछ मीडिया घरानों की पत्रकारिता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है।
खान सर: ईमानदारी की मिसाल
Aaj Tak की वरिष्ठ एंकर अंजना ओम कश्यप ने इस मामले में कोचिंग संस्थानों और खासकर यूट्यूब-ऑनलाइन शिक्षकों पर आरोपों की बौछार कर दी है। उन्होंने पूरे कोचिंग जगत को ‘माफिया’ करार देते हुए छात्रों और अभिभावकों की मेहनत को लूटने का आरोप लगाया। लेकिन क्या यह विश्लेषण निष्पक्ष है या सत्ता पक्ष की रक्षा करने वाली प्रोपेगैंडा पत्रकारिता?
वस्तुनिष्ठता से देखें तो पेपर लीक की समस्या नई नहीं है। बिहार समेत कई राज्यों में पिछले वर्षों में भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें प्रशासनिक लापरवाही, प्रिंटिंग प्रेस से लेकर परीक्षा केंद्रों तक की सांठगांठ उजागर हुई। ऐसे में केवल कोचिंग शिक्षकों पर सारा दोष मढ़ना सरल लेकिन अधूरा लगता है।
इस विवाद में बिहार के प्रसिद्ध शिक्षक खान सर ने छात्रों के हित में खुलकर आवाज उठाई। उन्होंने पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई की मांग की और कहा कि ऐसे अपराधों में सामान्य सजा पर्याप्त नहीं। खान सर न केवल लाखों छात्रों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराते हैं, बल्कि वे सामाजिक मुद्दों पर भी सही समय पर बोलते हैं। उनका रिकॉर्ड ईमानदारी और समर्पण का है। अंजना ओम कश्यप जैसे एंकर उनका सीधा नाम लेकर आलोचना करने की बजाय पूरे कोचिंग क्षेत्र को टारगेट कर रही हैं, जो संदेहास्पद है।
खान सर जैसे शिक्षक ग्रामीण और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए उम्मीद की किरण हैं। जब मुख्यधारा की शिक्षा महंगी हो गई है, तो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने लाखों युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मौका दिया। इन्हें ‘दो कौड़ी के टीचर’ कहकर अपमानित करना न केवल अनुचित है, बल्कि उन लाखों छात्रों का अपमान भी है जो इन शिक्षकों पर भरोसा करते हैं।
पत्रकारिता की जिम्मेदारी
अंजना ओम कश्यप की पत्रकारिता पर पहले भी पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जब सवाल उठते हैं, तो उनकी रिपोर्टिंग अक्सर सरकार की उपलब्धियों को हाइलाइट करने और असुविधाओं को नजरअंदाज करने वाली दिखती है। इस बार भी पेपर लीक के मूल कारण—NTA की व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही और बड़े स्तर की सांठगांठ—की बजाय केवल कोचिंग शिक्षकों पर हमला करना उसी सोच को दर्शाता है।
सोशल मीडिया पर आम लोग और छात्र उनकी इस ‘गंदी सोच’ की खुलकर आलोचना कर रहे हैं। एक तरफ छात्र पेपर लीक से अपना भविष्य बर्बाद होते देख रहे हैं, दूसरी तरफ कुछ एंकर पूरे मुद्दे को कोचिंग जगत की बदनामी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
निष्कर्ष
पत्रकारिता अगर सत्ता के चाटुकार बनकर रह जाएगी, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ेगा। खान सर प्रकरण इस गिरते स्तर का एक और प्रमाण है। अब समय आ गया है कि जनता स्वयं सच को पहचाने और जिम्मेदार, निष्पक्ष पत्रकारिता की मांग करे।


