प्रयागराज द्वादश माधव परिक्रमा: गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी पावन नदियों का मिलन स्थल प्रयागराज अपने अनादि काल से लेकर आज तक धर्म और आस्था को प्रज्वलित कर रहा है। प्रयागराज को धार्मिक ग्रंथों में ‘तीर्थों का राजा’ कहा गया है। ‘प्रयाग’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—’प्रथम यज्ञ भूमि’। ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण के बाद तीन वेदियों के रूप में इस स्थान को चुना था। मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे ग्रंथों में प्रयाग की महिमा का बड़ा ही सुंदर वर्णन मिलता है। प्रयागराज में ‘द्वादश माधव परिक्रमा’ की बहुत पुरानी परंपरा है। क्या आपको इससे मिलने वाले पुण्य के बारे में पता है? प्रथम यज्ञ भूमि की इस धरा पर 12 माधव स्थान हैं, जिनकी परिक्रमा आदिकाल से ऋषि-मुनि और भक्त करते आ रहे हैं। आइए आज इस धार्मिक महत्व को जानकर पुण्य प्राप्त करें और उनके दर्शन करके अपने जीवन को धन्य करें।
प्रथम यज्ञ भूमि प्रयागराज
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब इस ब्रह्मांड की रचना का समय आया, तो भगवान ब्रह्मा जी ने सबसे पहले यहीं पर यज्ञ किया था। उन्होंने जिस स्थान पर यज्ञ किया था, वही आज का प्रयागराज है। यज्ञ की वेदी के तीन कोणों की परिक्रमा करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है।
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विष्णु धाम की भूमि प्रयागराज और 12 माधव
बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रयागराज को ‘विष्णु धाम’ की भूमि भी कहा जाता है। यहाँ पर भगवान विष्णु ‘माधव’ के रूप में विराजमान हैं, जो प्रयागराज की रक्षा करते हैं और यहाँ के नगर देवता भी हैं। मत्स्य पुराण के ‘प्रयाग महात्म्य’ (अध्याय 103-112) में जिक्र आता है कि प्रयाग में एक बार संगम स्नान करने से इतना पुण्य मिलता है, जो अन्य किसी तीर्थ में हजारों बार स्नान करने के बराबर है। इसके साथ ही, जो व्यक्ति यहाँ अस्थि विसर्जन करता है या अंतिम समय में भगवान का स्मरण करते हुए इस देह को त्यागता है, वह सीधे बैकुंठ जाता है और उसे मोक्ष प्राप्त होता है। वास्तव में प्रयागराज की भूमि सभी पापों को नष्ट करने वाली और पुण्य को बढ़ाने वाली है। इसीलिए यहाँ संगम स्नान और महाकुंभ में करोड़ों श्रद्धालु वर्षों से आते रहे हैं।
इस धरती को ‘तीर्थराज’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ भगवान विष्णु अपने ‘द्वादश माधव’ स्वरूप में प्रकट हुए हैं। प्रयागराज आध्यात्मिक सुरक्षा, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का केंद्र स्थल भी है। इस धरा की रक्षा करने और पुण्य को बढ़ाने के लिए भगवान विष्णु द्वादश माधव के रूप में अवतरित हुए हैं। सभी पापों का विनाश करने वाली प्रयागराज की यह धरती हर इंसान को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है। यहाँ के 12 माधव पीठों की परिक्रमा करके आप भी पुण्य अर्जित कर सकते हैं। आइए, आपको 12 माधव पीठों का वर्णन और उनसे मिलने वाले फल के बारे में बताते हैं।
बारह माधव पीठ का वर्णन
मत्स्य पुराण के अनुसार, ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने यज्ञ के लिए प्रयागराज की भूमि को ही चुना। यज्ञ की त्रिकोण वेदी के तीन भाग होते हैं, जो प्रयागराज के विभिन्न स्थानों का परिचय कराते हैं। यज्ञ की ‘अंतर्वेदी’ का भाग अरैल क्षेत्र में पड़ता है, जबकि ‘मध्य वेदी’ दारागंज के इलाके में और ‘बाह्य वेदी’ गंगा पार झूंसी के क्षेत्र में है। हर भाग में चार-चार माधव स्थापित किए गए हैं और यही मिलकर ‘द्वादश (12) माधव’ कहलाते हैं, जो प्रयाग की रक्षा करते हैं। ‘माधव’ नाम भगवान विष्णु का ही एक रूप है, जिसका अर्थ है—लक्ष्मी (‘मा’) के स्वामी (‘धव’)। आज भी यहाँ इनके भव्य मंदिर बने हुए हैं और इसी रूप में पूजा-अर्चना होती है।
पौराणिक ग्रंथों में इन 12 माधव स्थानों की परिक्रमा का विशेष वर्णन आता है। ये 12 पीठ प्रयाग के विभिन्न क्षेत्रों में फैले हुए हैं। प्रत्येक माधव का अपना अलग स्वरूप, शक्ति और महत्व है। इनकी स्थापना सृष्टि की रक्षा, यज्ञ की पवित्रता और भक्तों के कल्याण के लिए की गई है। वहीं दूसरी कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण ने संगम की रक्षा हेतु माधव स्वरूप धारण किया था। द्वादश माधव का विस्तृत वर्णन हम यहाँ आपके लिए प्रस्तुत करने जा रहे हैं। अगर आप कभी प्रयागराज आएं, तो द्वादश माधव के दर्शन करना न भूलें और संगम स्नान करके पुण्य अर्जित जरूर करें।
प्रयागराज की रक्षा करने वाले द्वादश माधव मंदिरों का वर्णन
भगवान श्रीकृष्ण और विष्णु जी के स्वरूप को प्रदर्शित करने वाले ये द्वादश माधव मंदिर प्रयागराज के नगर देवता के रूप में स्थापित हैं। एक-एक माधव मंदिर और स्थान का वर्णन यहाँ नीचे दिया जा रहा है, ताकि जब भी आप यहाँ आएं, तो पूरी आस्था के साथ दर्शन कर अपने जीवन को सार्थक बना सकें
1. वेणी माधव
जैसा कि हमने आपको बताया, द्वादश माधव क्षेत्र की परिक्रमा का बहुत महत्व है और इसकी शुरुआत ‘वेणी माधव’ के दर्शन से ही होती है। यह मंदिर संगम क्षेत्र में दारागंज के पास गंगा किनारे स्थित है। वेणी माधव प्रयागराज के प्रधान नगर देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वेणी माधव चतुर्भुज रूप में लक्ष्मी जी के साथ विराजमान हैं, और उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा व पद्म हैं। यहाँ त्रिवेणी की पूजा भी होती है और यह मंदिर प्रयाग की रक्षा का मुख्य केंद्र है। संगम किनारे से यह मंदिर मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अगर आप दारागंज के दशाश्वमेध घाट आते हैं, तो यह बेहद पास पड़ता है।
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2. अनंत माधव
द्वादश माधव में दूसरा स्थान अनंत माधव का है। यह मंदिर भी दारागंज वेदी क्षेत्र के अंतर्गत ही आता है और परिक्रमा का दूसरा पड़ाव है। अनंत माधव भगवान की अनंत कृपा के प्रतीक हैं। यहाँ अनंत भक्ति और शक्ति के रूप में माधव जी का पूजन होता है। रेलवे स्टेशन से यह स्थान लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर, सप्लाई डिपो के आगे चौफटका के पास स्थित है। यहाँ हनुमान जी की एक प्राचीन प्रतिमा भी है और पूरा वातावरण अत्यंत शांत व भक्तिमय है।
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3. असि माधव
यह स्थान दारागंज के अस्सी घाट क्षेत्र में गंगा किनारे स्थित है। असि माधव भगवान के पाप-नाशक स्वरूप में विराजमान हैं। द्वादश माधव परिक्रमा का यह तीसरा पड़ाव है।
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4. मनोहर माधव
भक्तों के मन को हरने वाले स्वरूप में स्थित, दारागंज क्षेत्र में पड़ने वाला यह अगला माधव मंदिर है। भक्तों के मन में विष्णु भक्ति जगाने वाले मनोहर माधव के दर्शन करने से मन के सारे दोष दूर हो जाते हैं और ईश्वर में ध्यान लग जाता है।
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5. गदा माधव
धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु यहाँ गदा धारण किए हुए हैं। श्री गदा माधव भगवान का प्राचीन मंदिर यमुना पार नैनी क्षेत्र में स्थित है, जहाँ जाने का मार्ग बहुत ही सुगम है। यह मंदिर नैनी क्षेत्र के छिवकी रेलवे स्टेशन से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 12 माधव मंदिरों में से इस मंदिर को दक्षिणी बिंदु माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से भक्तों के सारे कष्ट और काल-भय शीघ्र ही दूर हो जाते हैं।
यहाँ भगवान विष्णु के दिव्य गदा-धारी रूप के दर्शन से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। अगर आप प्रयागराज के बस अड्डे, प्रयागराज जंक्शन या छिवकी रेलवे स्टेशन से इस मंदिर के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं, तो ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी से आसानी से पहुँच सकते हैं। यहाँ हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पंचमी को एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
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6. पद्म माधव
श्री पद्म माधव का प्राचीन मंदिर यमुना पार घूरपुर क्षेत्र के बीकर-देवरिया गाँव में स्थित है। आप प्रयागराज से अपनी प्राइवेट टैक्सी या ऑटो के माध्यम से यहाँ बहुत ही कम खर्चे में और आसानी से पहुँच सकते हैं। हाथ में कमल (पद्म) धारण किए हुए यह माधव स्वरूप शुद्धता, शांति और सौंदर्य का प्रतीक है।
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7. चक्र माधव
सातवें माधव के रूप में श्री चक्र माधव की पूजा होती है, जो यमुना पार अरैल क्षेत्र में स्थित है। श्री चक्र माधव का यह मंदिर प्रसिद्ध सोमेश्वर नाथ मंदिर के निकट है। 12 माधव में चक्र माधव को कालचक्र और धर्मचक्र का प्रतीक माना जाता है। इस क्षेत्र का विकास अब बहुत तेजी से हो चुका है, जिससे श्रद्धालु अपने निजी वाहनों या ऑटो से यहाँ आसानी से आ-जा सकते हैं।
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8. बिंदु माधव
परमात्मा के सूक्ष्म तत्व के प्रतीक के रूप में बिंदु माधव का स्थान द्रौपदी घाट पर स्थित है। यह एक बेहद रमणीय स्थल है, जहाँ कभी गंगा जी बिल्कुल किनारे से बहती थीं (अब गंगा माता यहाँ से करीब 500 मीटर दूर हैं)। बिंदु माधव परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहाँ बड़े हनुमान जी की तरह ही लेटे हुए हनुमान जी की एक विशाल और भव्य मूर्ति भी है।
मान्यता है कि यहाँ बिंदु माधव के पूजन से जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं। घाट के आसपास अन्य मंदिर भी स्थापित हैं, जिनमें भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की मूर्तियां हैं। प्रयागराज जंक्शन से मात्र 6 किलोमीटर दूर स्थित इस धाम पर आप ई-रिक्शा या प्राइवेट साधन से आ सकते हैं। यहाँ आने के बाद भक्तों को एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है।
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9. शंख माधव
भगवान विष्णु के माधव रूपों में से एक ‘श्री शंख माधव’ का भव्य मंदिर छतनाग क्षेत्र (मुंशी बगीचा) में स्थित है। शंखधारी माधव की शंखध्वनि से सभी अशुभ तत्वों का नाश होता है। मुगल काल के दौरान इन मंदिरों की परिक्रमा पर पाबंदी लगा दी गई थी और प्राचीन विग्रहों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया था, जिसके कारण आधुनिक युग में लोग इस स्थान के महत्व को भूलने लगे थे। परंतु आजादी के बाद यहाँ संरक्षण कार्य हुआ और परिक्रमा की परंपरा पुनः जीवित हुई।
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10. संकटहर माधव
दसवें माधव के रूप में भगवान संकटहर (संकष्टहर) माधव प्रयागराज के झूंसी क्षेत्र में स्थित हैं। भक्तों के सभी संकटों और कष्टों को हरने वाले इस माधव स्वरूप का दर्शन करना बेहद कल्याणकारी माना जाता है।
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11. अक्षय वट माधव
त्रिवेणी संगम क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध अक्षय वट के नजदीक ही अक्षय वट माधव का स्थान है। इस वट वृक्ष को अविनाशी (कभी न नष्ट होने वाला) कहा गया है। संगम से कुछ ही कदमों की दूरी पर स्थित होने के कारण यहाँ पहुँचना बेहद आसान है।
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12. आदि माधव / योग माधव
झूंसी क्षेत्र में आदि माधव (जिन्हें योग माधव या आदि वट माधव भी कहा जाता है) का स्थान है। यह माधव मंदिर आदि सृष्टि और योग मार्ग का प्रतीक है।
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जीर्णोद्धार और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रयास
मुगल शासन और ब्रिटिश काल के समय प्रयागराज के इन माधव मंदिरों और उनके विग्रहों को काफी क्षति पहुँचाई गई थी, जिससे परिक्रमा की यह पावन परंपरा लंबे समय तक प्रभावित रही। परंतु अब स्थानीय निवासियों और उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा इन मंदिरों का भव्य जीर्णोद्धार किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए आने-जाने के मार्गों को पक्का किया जा रहा है, मंदिर प्रांगणों को सुंदर व आकर्षक बनाया जा रहा है, और यात्रियों के ठहरने के लिए विश्राम गृहों का निर्माण भी कराया जा रहा है।
माधव पीठ की परिक्रमा से मिलता है महापुण्य
पुराणों में वर्णित है कि द्वादश माधव परिक्रमा का फल असीम है। मत्स्य पुराण के अनुसार, इन बारह माधवों की पूर्ण परिक्रमा करने वाले भक्तों को समस्त तीर्थों, देवी-देवताओं के दर्शन और यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। यह यात्रा आत्मशुद्धि, पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। पौराणिक कथाओं में इसे ‘मोक्षदायिनी यात्रा’ कहा गया है, जिसे प्राचीन काल में स्वयं ऋषि-मुनि किया करते थे।
द्वादश माधव परिक्रमा का ऐतिहासिक महत्व
प्राचीन काल में महर्षि भारद्वाज स्वयं द्वादश माधव की परिक्रमा किया करते थे, जिससे इसके ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। मुगल और ब्रिटिश शासकों ने भारतीय संस्कृति की एकता और इस धार्मिक परंपरा को तोड़ने के लिए परिक्रमा पर रोक लगा दी थी, जिसके कारण यह परंपरा बीच में बाधित हो गई थी।
देश की आजादी के बाद परिक्रमा का पुनरुत्थान
स्वतंत्रता के बाद, पूज्य संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी ने लुप्त हो चुके द्वादश माधव स्थानों की खोज की। इसके बाद, सन 1961 में शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी ने धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में माघ महीने के दौरान इस परिक्रमा को दोबारा शुरू करवाया। यह परंपरा 1987 तक निरंतर चलती रही, पर बाद में कुछ समय के लिए फिर रुक गई। इसके बाद 1991 में स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी जी ने इसे पुनः आरंभ कराया। हाल ही में, महाकुंभ 2025 के पावन अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘द्वादश माधव सर्किट’ परियोजना के तहत इन सभी 12 पीठों का कायाकल्प किया गया है और सड़कों व बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त कर इस ऐतिहासिक परंपरा को भव्य रूप दिया गया है।
- द्वादश माधव पीठ परिक्रमा से मिलने वाले लाभ
- भक्तों के समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों का नाश होता है।
- पितरों को तृप्ति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- मन को परम शांति मिलती है और संकल्प शक्ति व आंतरिक बल में वृद्धि होती है।
- जीवन की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता का संचार होता है।
- यह यात्रा साधक को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाती है।
12 माधव पीठ की परिक्रमा कैसे करें? (व्यावहारिक गाइड)
द्वादश माधव की परिक्रमा के लिए मन में सच्ची श्रद्धा और शुद्धता का होना आवश्यक है। सुबह स्नान करने के बाद वेणी माधव मंदिर से इस यात्रा की शुरुआत की जाती है। प्रत्येक मंदिर में जाकर दर्शन करें, आरती में सम्मिलित हों, नाम-मंत्रों का जाप करें और सामर्थ्य अनुसार दान-पुण्य करें। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद त्रिवेणी संगम में स्नान करना अनिवार्य माना जाता है। पूरी यात्रा के दौरान सात्विक भोजन का ही पालन करें।
यदि आप एक दिन में परिक्रमा पूरी करना चाहते हैं, तो सुबह 6:00 बजे वेणी माधव मंदिर से शुरुआत करें। दोपहर तक दारागंज क्षेत्र के मंदिरों के दर्शन पूरे करें, और अपराह्न (दोपहर बाद) तक अरैल, नैनी व झूंसी क्षेत्र के मंदिरों को कवर करें। शाम के समय संगम स्नान के साथ आप इस यात्रा को संपन्न कर सकते हैं। ऑटो, कैब या ई-रिक्शा के माध्यम से इस पूरे रूट को 8 से 10 घंटे में आसानी से पूरा किया जा सकता है।
द्वादश माधव पीठ परिक्रमा पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: प्रयागराज में कुल कितने माधव पीठ स्थित हैं?
उत्तर: प्रयागराज में भगवान विष्णु के कुल 12 (द्वादश) माधव पीठ स्थित हैं, जिन्हें नगर का रक्षक देवता माना जाता है। इस परिक्रमा की शुरुआत दारागंज स्थित ‘वेणी माधव’ मंदिर से होती है।
प्रश्न 2: क्या सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी ने यहाँ यज्ञ किया था?
उत्तर: जी हाँ, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के समय प्रयागराज की भूमि को ही अपनी प्रथम यज्ञ भूमि के रूप में चुना था।
प्रश्नउत्तर 3: साल 1991 के बाद बंद हुई इस परिक्रमा को दोबारा किसने शुरू करवाया?
उत्तर: सन 1991 के बाद कुछ समय के लिए बाधित हुई इस ऐतिहासिक परिक्रमा को महाकुंभ 2025 के अवसर पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के संतों के सहयोग से भव्य रूप में दोबारा शुरू करवाया है और इसके लिए विशेष ‘द्वादश माधव सर्किट’ का विकास किया गया है।
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प्रश्न 4: प्रयागराज में वेणी माधव मंदिर कहां पर स्थित है? कैसे जाएं?
उत्तर: वेणी माधव मंदिर दारागंज में स्थित है। प्रयाग जंक्शन से दारागंज के लिए टेंपो आसानी से मिल जाता है। आप ई रिक्शा से जा भी सकते हैं। अगर आप संगम पर है तो यहां से दारागंज ई-रिक्शा से जा सकते हैं। लगभग 2 किलोमीटर से कम की दूरी पर ही वेणी माधव जी का मंदिर स्थित है।







