केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत तीन भाषा फॉर्मूला को आगे बढ़ाते हुए महत्वपूर्ण फैसला लिया है। कक्षा 6 से तीन भाषाओं की पढ़ाई इसी सत्र से लागू हो चुकी है। अब नई जानकारी के अनुसार जुलाई 2026 से कक्षा 9 में भी तीसरी भाषा की पढ़ाई शुरू कर दी जाएगी।
तीन भाषा नीति क्या है?
नई शिक्षा नीति के अंतर्गत कक्षा 6 से 10 तक हर विद्यार्थी को कम से कम तीन भाषाएं पढ़नी अनिवार्य हैं। इसका उद्देश्य भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करना तथा विद्यार्थियों को बहुभाषी बनाना है।
विद्यार्थी अपनी पसंद के अनुसार भाषाएं चुन सकते हैं:
भाषा-1 (R1): मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा/हिंदी
भाषा-2 (R2): अंग्रेजी या कोई अन्य भारतीय भाषा
भाषा-3 (R3): कोई भारतीय भाषा (संस्कृत, उर्दू, बंगाली आदि) या विदेशी भाषा
मुख्य नियम: तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। अंग्रेजी को विदेशी भाषा की श्रेणी में रखा गया है।
उत्तर प्रदेश में तीसरी भाषा के विकल्प
उत्तर प्रदेश में ज्यादातर स्कूलों में तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को प्राथमिकता दी जाएगी। हालांकि विद्यार्थियों को अपनी पसंद से निम्न विकल्प उपलब्ध होंगे:
- संस्कृत
- उर्दू
- कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा
- विदेशी भाषा (जर्मन, फ्रेंच, जापानी आदि)
स्कूलों के लिए अलग-अलग भाषाओं के शिक्षक उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, इसलिए अधिकांश स्कूल हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत के संयोजन पर ही जोर देंगे।
मूल्यांकन व्यवस्था
तीसरी भाषा (R3) का बोर्ड परीक्षा में शामिल न किए जाने की संभावना है। इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर किया जाएगा। यह विद्यार्थियों के लिए बड़ी राहत की बात है।
मुख्य बातें
- कक्षा 6 से 10 तक तीन भाषाएं अनिवार्य
- कम से कम दो भारतीय भाषाएं जरूरी
- कक्षा 9 में तीसरी भाषा की पढ़ाई
जुलाई 2026 से शुरू
R3 का मूल्यांकन आंतरिक होगा
अपडेट
ताजा अपडेट बता दे कि कक्षा 9 से शुरू हो रही तीसरी भाषा के लिए कक्षा 6 की स्तर का पाठ्यक्रम चलाया जाएगा। इसके अलावा चौथी भाषा के रूप में चाहे तो स्कूल अपनी बच्चों के लिए जर्मन फ्रैंच या कोई भाषा चला सकता है। विदेश में पढ़ने वाले सीबीएसई बच्चों के लिए विशेष सुविधा में r3 में छूट दी गई है।
एक्सपर्ट सलाह कक्षा 9वी के विद्यार्थियों के लिए
सीबीएसई बोर्ड में तीन भाषा के नियम लागू हो चुका है। हम यहां आपको एक्सपर्ट टीचर की सलाह देने जा रहे हैं कि यदि आप की हिंदी अच्छी है तो R1 में आप हिंदी रखें r2 में आप अंग्रेजी रखें और r3 में आपके लिए संस्कृत भाषा हो सकती है क्योंकि कई स्कूलों में कक्षा 6 से संस्कृत तो पढ़ाई भी जाती है और आपने अगर संस्कृत पढ़िए तो आज के लिए तीसरी भाषा के रूप में काम आ सकता है।
इसके अलावा तीसरी भाषा के रूप में आपको कोई रीजनल भाषा पसंद है तो वह भी रख सकते हैं। हिंदी के साथ संस्कृत तो पढ़ना बहुत आसान हो सकता है। दरअसल संस्कृत के अधिकांश शब्द हिंदी में भी प्रयोग होते हैं और इसके थोड़े से रूप और लाकर अलग होते हैं जिस कारण से संस्कृत की जानकारी आप आसानी से हासिल कर सकते हैं। इसकी देवनागरी लिपि हिंदी के देवनागरी लिपि जैसी ही होती है।
आपको बता दे की R1 भाषा का सिलेबस चाहे आप इसमें अंग्रेजी हिंदी या कोई भी रीजनल लैंग्वेज या फॉरेन लैंग्वेज चुनते हैं तो इसकी कठिनाई का लेवल R1 में सबसे अधिक होगा। इसी तरह R2 लैंग्वेज का कठिनाई का स्तर R1 के मुकाबले कम होगा और R3 लैंग्वेज का कठिनाई का स्टार R1 व R2 के मुकाबले बहुत कम होता है।
अंत में यह भी जरूरी है जानना:
आपको बता दें कि शिक्षा नीति में हुए नए बदलाव के कारण तीन भाषा सीखना अनिवार्य कर दिया गया है। दरअसल भारत के बच्चों को बहुभाषी बनाने और यहां की विविधता और संस्कृति की जानकारी देने तथा अनेकता में एकता का पाठ पढ़ाने के लिए भाषा दक्षता ज्ञान होना जरूरी है। काफी अरसे से भाषा विवाद के चलते यह भाषाओं को लागू कर पाना कठिन हो जा रहा था। ऐसे में R1, R2, R3 तीन भाषा नियम लागू करके भारतीय संस्कृति और भारतीय विरासत को एकता के सूत्र में पिरोने का बढ़िया काम नई शिक्षा नीति के अंतर्गत किया गया है। इससे बच्चे भारतीय भाषाओं के बारे में जानेंगे और उनके जरिए संस्कृति, साहित्य, समृद्ध परंपरा को भी जानेंगे।



