मोबाइल गुरु है इंस्टाग्राम सिलेबस घर-घर चल रहा है संस्कार विहीन स्कूल

By: A.K. Pandey

On: 30 July 2026

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मोबाइल गुरु

मोबाइल गुरु है इंस्टाग्राम सिलेबस : मोबाइल बाबा जी आ गए हैं! जब समाज बिना कारण गुरु की गलती निकालने लगे, तो समझ लो कलयुग का अंतिम चरण चल रहा है। मजाक बिल्कुल नहीं कह रहा हूं बल्कि सीरियसली। आजकल समाज इतना होशियार हो गया है कि वह खुद तो गंदे रील्स खा-खाकर मोटा हो रहा है, और दोष पूरा गुरु के सिर पर रख देता है। मानो गुरु ही वह जादूगर है जिसके मंत्र से बच्चे बिगड़ते हैं, राजनीति बिगड़ती है, और देश का शिक्षा बजट कम हो जाता है।

मोबाइल गुरु की भूमिका में दे रहा है बच्चों को उल्टा ज्ञान

पुराने जमाने में कहा जाता था—हर माता-पिता का आईना उसका बच्चा होता है। आज यह कहावत पूरी तरह उल्ट गई है। अब समाज को देखना हो तो बच्चे के मोबाइल स्क्रीन पर झांक लो। हर बच्चा मोबाइल को अपना गुरु मानता है, रील्स को अपना सिलेबस और इंस्टाग्राम को अपना गुरुकुल। घर-घर में “संस्कारी” शिक्षा चल रही है—जहाँ उठने-बैठने, खाने-पीने, बात करने का कोई नियम नहीं, सिर्फ वायरल होना है। नैतिकता? वह तो पुरानी किताबों में दब गई है।

मोबाइल बाबा के चरणों में बैठा है समाज

आज का बच्चा सोचता है कि अगर फोटो में सही एंगल और कैप्शन में थोड़ा सा “ऐटिट्यूड” आ गया तो बाकी सब बेकार है। गुरु तो क्या, पूरा समाज अब मोबाइल बाबा के चरणों में बैठा है।
और गुरु? बेचारे गुरु अब समाज के बीच में ऐसे घिरे हैं जैसे शेर के पिंजरे में बकरी। समाज बिगड़ा तो शिक्षा को कोसा जाएगा, गुरु को कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा। राजनीति में गड़बड़ी हुई तो भी गुरु की कक्षा में जाकर पूछेंगे—“आपने क्या पढ़ाया था?” मानो गुरु के पास “अच्छे नेता बनाने वाली मशीन” छिपी हुई है, और वह जानबूझकर उसे इस्तेमाल नहीं कर रहा।

गुरु संस्कार देता है मोबाइल संस्कार छीन लेता

गुरु धरती पर सबसे बड़ा भार ढोने वाला प्राणी बन चुका है। पढ़ाना तो बस औपचारिकता है। असल में वह क्लर्क है, काउंसलर है, दो बच्चों के बीच झगड़ा सुलझाने वाला अभागा जज है, माता-पिता की शिकायत सुनने वाला ग्राहक सेवा अधिकारी है, और कम सैलरी में जीवनयापन करने वाला “संस्कार मशीन” है। लोग सोचते हैं—गुरु को थोड़ा डाँट दो, थोड़ा दोस्त बना लो, थोड़ा अपमानित कर दो, तो जीवन सुधर जाएगा। जैसे गुरु के पास जादुई छड़ी हो जो एक झटके में बच्चे को संस्कारी, राजनीति को साफ और समाज को स्वर्ग बना दे।

गुरु पर हर तरफ से बढ़ता दबाव, सम्मान होता जा रहा कम

भारत में गुरु अब “बहू” बन गया है। चारों तरफ से दबाया जाता है—घर वाले भी, समाज वाले भी, अधिकारी भी, और मोबाइल वाले भी। संस्कार और धर्म के नाम पर कभी पूजा होती थी, आज रिस्पेक्ट का नामो-निशान नहीं। बाल गुरु? अब तो बाल गुरु भी कुछ नहीं। असली गुरु तो स्क्रीन पर नाचने वाला रील वाला है, जो दिन-रात मुफ्त में “शिक्षा” दे रहा है।
तो हे समाज के बुद्धिमान लोगों! गुरु को छोड़ दो। अब मोबाइल बाबा की आरती उतारो। रील्स को पाठ्यक्रम बनाओ, इंस्टाग्राम को बोर्ड परीक्षा का हॉल बनाओ। और जब अगली पीढ़ी पूरी तरह “संस्कारहीन” हो जाए तो फिर से गुरु को बुलाकर कहना—“आपने क्यों नहीं रोका?”
क्योंकि दोष तो हमेशा गुरु का ही होता है। बाकी सब तो निर्दोष दर्शक हैं, जो सिर्फ लाइक और शेयर करते हैं।

लेखक इंटरनेशनल और नेशनल समाचार और संपादकीय लेखन से जुड़े रहे हैं। विभिन्न तरह के लेखन और संपादकीय का 10 साल से अधिक अनुभव है.

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