रेलवे ट्रैक के बीच से पैदा हो रही बिजली: प्रकृति में समाया स्वच्छ देश स्विट्जरलैंड। अपनी नई तकनीक के लिए हमेशा से चर्चा में रहा है। पारंपरिक ऊर्जा की जगह पर सोलर पैनल में पूरी दुनिया में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोलर पैनल लगाने के लिए जगह की जरूरत पड़ती है। अमूमन इमारत के ऊपर सोलर पैनल लगाया जाता है। मैदानी इलाकों में जहां सूरज की रोशनी अच्छी हो वहां पर लगाया जाता है लेकिन सबसे बड़ी समस्या मैदानी जमीन की होती है। लेकिन स्विट्जरलैंड ने इस समस्या का हल निकाल लिया है।
रेलवे ट्रैक के बीचों-बीच सोलर पैनल लगाया है। दरअसल रेलवे लाइन के बीच में जगह होती है। इसी जगह का इस्तेमाल किया गया है। सोलर पैनल ट्रैक पर लंबी दूरी तक लगाया जाता है। इसके ऊपर से दौड़ती हुई ट्रेन गुजरती है। सोलर पैनल पर किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं होता है। बल्कि इसके कई फायदे हैं सोलर पैनल इन ट्रैकों पर लगाया जाता है जो एक सुरक्षित जगह है। यहां से सूरज की रोशनी सोलर पैनल पर पड़ती है तो बिजली का उत्पादन होता है। स्विट्जरलैंड की अनोखी हकीकत जानकर आपको भी आश्चर्य हो रहा लिए पूरी बात बताते हैं।
सूरज की रोशनी को बिजली में बदलने का अनोखा स्टार्टअप
पश्चिमी स्विट्जरलैंड के बूट्स गांव के नजदीक चमत्कार हो रहा है। दरअसल यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी योजना है जिसे सन-वेज़ (Sun-Ways) योजना कहा जाता है यह 24 अप्रैल 2025 को शुरू हुआ था। इस बड़ी परियोजना में रेलवे ट्रैक के 100 मीटर लंबे हिस्से पर 48 फोटोवोल्टिक पैनल बिछाया गया।
इन पैनल को ट्रैक के बीचो-बीच बहुत ही बुद्धिमानी से लगाया गया है। यह इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी का नया तरीका है जो बिजली उत्पादन में मददगार साबित हो रहा है।
नहीं करनी पड़ती है ट्रेन की गति को धीमा
ट्रैक पर सोलर पैनल के ऊपर से जब ट्रेन तेज़ गति गुजरती है तो किसी भी तरह की कोई दिक्कत सोलर पैनल में नहीं आता है। इसके साथ ही पैनल को पूरी तरीके से हटाया जा सकता है और इसका रखरखाव बड़ी आसानी से हो जाता है दोबारा पैनल खराब होने पर इसे लगाया जा सकता है।
सबसे बड़ी बात है कि इतने बड़े हिस्से में सोलर पैनल लगाने के लिए बड़ी जमीन की जरूरत होती है और जंगल भी काटे जाते हैं। ऐसे में जंगलों का काटना भी नहीं होता है और सोलर पैनल इन ट्रैक के बीच में लगाया गया है। जिससे कि मुफ्त में बिजली आसानी से मिलती है। कहीं-कहीं बेकार पड़ी रेलवे की जमीन पर भी यह पैनल लगाया गया है।
ट्रैक सोलर पैनल की टेक्नोलॉजी
दरअसल संवेग ने स्विच ट्रैक रख रखाव कंपनी से उधर के साथ मिलकर या कमल का इंस्टालेशन किया है। इसमें पहले से असेंबल किए हुए 1 मीटर चौड़े पैनल को पुत्री के बीच में बिछाया जाता है। आप समझ सकते जैसे कोई कालीन बिछी गई हो। यह चमकदार सोलर पैनल सूरज की रोशनी को अपने में समा लेते हैं। जिससे कि बिजली तारों के के जरिए भेजा जाता है और इसका इस्तेमाल किया जाता है।
इस परियोजना में बहुत तेजी से कम हो रहा है एक दिन में 1000 वर्ग मीटर तक क्षेत्र कर करने की क्षमता है। आपकी जानकारी के लिए बता दे कि अभी 18 किलोवाट का छोटा पायलट प्रोजेक्ट योजना है। यह साल भर में लगभग 16000 किलोवाट घंटे बिजली पैदा करती है।
अपने टेस्ट में हुआ यह सफल
यह पायलट योजना आखिरकार सफल हो गया है। पहले यह आशंका थी कि ट्रैक के ऊपर से चलने वाले ट्रेन की कंपन की वजह से और ब्रेकिंग से निकलने वाली धातु की धूल और मौसम का इस पर प्रभाव पड़ सकता है लेकिन ऐसा नहीं है दरअसल कंपनी की वजह से यह सारी समस्याएं अपने आप को खुद से ही ठीक हो जाती है।
3 साल तक किए गए रोमांचक परीक्षण में कंपनी ने पाया कि यह पूरी तरीके से सुरक्षित और कामयाब परियोजना है। इसे पूरे स्विट्जरलैंड में जल्द लागू किया जाएगा।
यह क्रांतिकारी परिवर्तन कृषि भूमि को बचाने में मददगार साबित होता है। ऐसी खास बात है कि पहले सी ट्रैक पर इंफ्रास्ट्रक्चर बना होता है इसलिए दोबारा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की लागत नहीं आती है। शहरों और गांव के पास स्वच्छ ऊर्जा का साधन बन जाता है।
आर्टिकल निष्कर्ष
सन-वेज़ का यह कमाल का आईडिया पूरे संसार में अपना ध्यान आकर्षित कर रहा है। भारत जैसे देश अगर इस तकनीक को अपना ले तो ऊर्जा संकट की समस्या पल भर में दूर हो सकती है।
आपके क्या विचार हैं क्या यहां टेक्नोलॉजी भारत में आनी चाहिए। अपने विचार कमेंट के जरिए हमें जरूर बताएं।
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